बिहार ने खुलकर बता दिया है कि पलायन, रोजगार और सुराज उनके लिए कोई मुद्दा नहीं है। बिहारियों का सबसे बड़ा धेय है, अनंत सिंह जैसे रंगदारों और गुंडों की जीत सुनिश्चित करना।
जनता के सुराज का सपना, रोजगार और पलायन जैसी बातें उनके लिए कोई मायने नहीं रखतीं। असल में जिसे पलायन कहकर बदनाम किया जा रहा है, वह उनका देशाटन है। ट्रेनों में ठुंसकर, लटककर छठ पर लौटना उनका एडवेंचर है। उसमें कोई खलल स्वीकार्य नहीं।
रोजगार बिहार के लिए कोई जरूरत ही नहीं है। रोजगार तो उन्हें पंजाब, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर – उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के दुर्गम इलाकों में भी मिल जाता है, जहां कोई और काम करके राजी नहीं होता।
बिहार की महिलाओं के लिए चुनाव के समय मिले दस हजार रुपए ही भविष्य की सबसे बड़ी हकीकत हैं। इस रुपया के आगे-पीछे उन्हें कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं है।
सोचने के लिए प्रदेश के रंगबाज नेता हैं न! जो विधानसभा में भी खड़े होकर कह सकता हो कि ‘बाहर गिराना चाहिए।’
… स्त्री कल्याण की ऐसी अवधारणा तो कभी जेपी, डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद भी न सोच पाए थे। चुनाव के समय 10 हजार रुपया और ‘बाहर गिराना’ स्त्री कल्याण की इतनी उच्चतम अवधारणा मगध की महान भूमि पर ही संभव है। इसके आगे कौशल, अवध, हस्तिनापुर, कैकेय, किष्किंधा सब नतमस्तक हैं।
प्रशांत किशोर तुम अभी किशोर ही निकले, जवान न हो पाए! इसलिए पूरा बिहार घूमकर भी तुम बिहार को नहीं समझ सके।
वैसे भी बिहार घूमने से समझ नहीं आता। घूमकर कैसे समझोगे? बिहार का मन तो खुद बाहर बसा है। बिहार को बाहर से समझो, जैसे मोदी समझता है! पंजाब के गांव का छोटे से छोटा जमींदार भी बिहार को समझता है, भले ही वह कभी बिहार न गया हो। गुजरात का एक एक फैक्ट्री वाला, दुकान वाला, चाय की पटरी वाला भी बिहार को समझता है और प्रशांत किशोर पूरा बिहार घूमकर भी बिहार को नहीं समझ सका।
प्रशांत जिस दिन तुम बिहार को समझ लोगे, उस दिन किशोर से जवान हो जाओगे! अगर बिहार में नेता ही बनना है तो रंगबाज हो जाओगे।
मुझे लगता है प्रशांत कि अब तुम्हें भी रोजगार के लिए किसी दूसरे राज्य की कंपनी या राजनैतिक पार्टी को कंसल्टेंसी सेवाएं ही देते रहना होगा! दूसरे राज्यों में बिहारियों के लिए बहुत रोजगार है। इसलिए बिहार में रोजगार और सरकारी नौकरियां पैदा करने की कोई जरूरत नहीं है! बिहार की जनता ने यह संदेश तुम्हारे मुंह पर चिपका दिया है! अब चैन से बैठो!


