*पत्रकार हों गए ‘बे-सहारा’ :
*अपने दौर में पत्रकारों को सबसे अच्छा वेतन देने वाला अखबार बंद
पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का सीधा प्रमाण आज देखने को मिला जब राष्ट्रीय सहारा अखबार का मसला सामने आया. असल में पत्रकारिता के सामने आने वाली चुनौतियों को समझ पाना उन लोगो के बस में नही है, जिन्होंने पत्रकारिता की नौकरी नहीं की।
कई लोग पत्रकारिता में दलाली करने के लिए आते है उनके लिए चुनौतियों का कोई मतलब नही होता। क्योंकि उनका काम वेतन से नहीं चलता उनको केवल दलाली से मतलब होता है. ऐसे लोग रंगे सियार होते है।
यह बात उनकी समझ में आएगी जिनका घर परिवार पत्रकारिता से चलता है। जब राष्ट्रीय सहारा अखबार शुरू हुआ था वो लखनऊ के सबसे अच्छी सैलरी वाला अखबार था। उनका ऑफिस सबसे अच्छा था।
राष्ट्रीय सहारा वर्ष 1992 से लगातार प्रकाशित हो रहा था, लेकिन 8 जनवरी 2026 को बिना किसी पूर्व नोटिस के इसका प्रकाशन अचानक रोक दिया गया। जिससे सैकड़ों पत्रकार और कर्मचारी बेरोज़गार हो गए।
कोरोना के बाद बहुत सारे पत्रकारो के सामने नौकरी जाने, वेतन कटौती, और तमाम सुविधों में कटौती की गई. ऐसे में पत्रकारों की मदद करने कोई नही आया. सहारा अखबार के जो पत्रकार साथी बेरोजगार हुए हैं उनके लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है।
इनमें तमाम पत्रकार ऐसे हैं जिनको अब जॉब नहीं मिलेगी. इस तरह की चुनौतियों को असली पत्रकार ही समझ सकते हैं।

