NIT जमशेदपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन, महिला शिक्षा को भारतीय दृष्टि, संस्कार, मूल्यबोध एवं सामाजिक सरोकारों से जोड़ने पर जोर……

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NIT जमशेदपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन, महिला शिक्षा को भारतीय दृष्टि, संस्कार, मूल्यबोध एवं सामाजिक सरोकारों से जोड़ने पर जोर……

जमशेदपुर, 10 सितंबर 2026।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) जमशेदपुर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “महिला शिक्षा और संस्कार : परंपरा, परिवर्तन और भविष्य-दृष्टि” का गुरुवार को समापन हुआ। 9 एवं 10 सितंबर को आयोजित इस संगोष्ठी में महिला शिक्षा के विभिन्न ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं समकालीन आयामों पर विशेषज्ञों एवं शिक्षाविदों ने विचार-विमर्श किया।महिला शिक्षा के ऐतिहासिक एवं भारतीय परिप्रेक्ष्य पर मंथनसंगोष्ठी के दूसरे दिन “महिला शिक्षा : ऐतिहासिक, सामाजिक परिप्रेक्ष्य और भारतीय पाठ्यक्रम की दृष्टि” विषय पर तृतीय सत्र आयोजित किया गया। सत्र का संचालन डॉ. एकादशी जी, महाराष्ट्र ने किया।

मुख्य वक्ता प्रो. सविता रॉय, प्राचार्य, दौलतराम महाविद्यालय, नई दिल्ली ने महिला शिक्षा के ऐतिहासिक एवं सामाजिक विकास तथा भारतीय पाठ्यक्रम की दृष्टि पर अपने विचार रखे।इसके पश्चात परिचर्चा आयोजित हुई। सत्र में प्रो. नीलांबरी जी, संरक्षक, महिला कार्य, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं पूर्व कुलपति, सौराष्ट्र विश्वविद्यालय, राजकोट, गुजरात ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ललिता राणा, विषय संयोजिका, झारखंड प्रांत, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने किया।समकालीन चुनौतियों और समाधान पर चर्चाइसके बाद “समकालीन चुनौतियाँ और समाधान” विषय पर चतुर्थ सत्र आयोजित हुआ।

सत्र का संचालन श्रीमती मोमी सैकिया, गुवाहाटी ने किया। मुख्य वक्ता अरुणिमा मिश्रा, अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज एवं डीपीएस जमशेदपुर ने महिलाओं के सामने आने वाली समकालीन चुनौतियों तथा उनसे मुकाबला करने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास और संतुलन पर अपने विचार रखे।सत्र में परिचर्चा के पश्चात श्रीमती पूर्णिमा साहू, विधायक, जमशेदपुर पूर्व ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। धन्यवाद ज्ञापन सुश्री मोनिका आभा, अमरकंटक ने किया।

समारोप सत्र में महिला शिक्षा और राष्ट्र निर्माण पर जोरइसके पश्चात समारोप सत्र आयोजित किया गया, जिसका संचालन डॉ. कविता परमार ने किया। सत्र में प्रो. नीलांबरी जी का स्वागत भाषण हुआ। प्रो. सरोज शर्मा, कुलपति, रांची विश्वविद्यालय, रांची ने विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने विचार रखे, जबकि मुख्य अतिथि श्री शिवपूजन पाठक, सूचना आयुक्त, झारखंड राज्य सूचना आयोग ने संबोधित किया।श्री शिवपूजन पाठक ने नारी को बताया समाज और राष्ट्र की केंद्रबिंदुमुख्य अतिथि श्री शिवपूजन पाठक ने अपने संबोधन में नारी को समाज और राष्ट्र की केंद्रबिंदु बताते हुए मातृशक्ति और मातृभक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टि में नारी केवल परिवार की आधारशिला नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति है।उन्होंने कहा कि भारत की जिम्मेदारी केवल अपने विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के भरण-पोषण और कल्याण की भी है।

भारतीय चिंतन में नारी को प्रकृति तत्व और शक्ति के रूप में देखा गया है।श्री पाठक ने कहा कि सामाजिक आंदोलनों में महिलाओं की महत्वपूर्ण सहभागिता रही है तथा समाज को खड़ा करने में नारी की अहम भूमिका रही है। उन्होंने भारतीय इतिहास में महिलाओं के योगदान के विभिन्न उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि नारी शक्ति के बिना समाज और राष्ट्र का समग्र विकास संभव नहीं है।उन्होंने कहा कि मातृत्व और स्त्रीत्व दोनों का संरक्षण एवं सम्मान आवश्यक है। प्रत्येक महिला को आत्मचिंतन करते हुए यह विचार करना चाहिए कि “मैं कौन हूं, मुझे कितना बोलना है और मेरे व्यवहार एवं निर्णयों का आने वाली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा।”उन्होंने आधुनिकता को स्वीकार करते हुए परिवार एवं समाज को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि आधुनिकता के साथ भारतीय संस्कार एवं सामाजिक दायित्व का संतुलन आवश्यक है।

प्रो. सविता सेंगर ने महिला शिक्षा के उद्देश्य पर रखे विचारसमारोप सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सविता सेंगर, राष्ट्रीय सह-सचिव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं कुलपति, झारखंड राज्य विश्वविद्यालय, रांची ने इस बात पर विचार करने की आवश्यकता बताई कि “महिला शिक्षा से हम चाहते क्या हैं?”उन्होंने कहा कि महिला शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री अथवा रोजगार प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा को जीवन के स्वाभाविक एवं व्यापक आयाम से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के अंतर को समझने पर जोर दिया।उन्होंने कहा कि संस्कार किसी बंधन का नाम नहीं है, बल्कि अपने निर्णयों के परिणाम को समझना और उसकी जिम्मेदारी स्वीकार करना है।

परंपरा और परिवर्तन के बीच संतुलन, ज्ञान के साथ विवेक, समता एवं दायित्वबोध आवश्यक है।प्रो. सेंगर ने कहा कि हमें यह भी विचार करना चाहिए कि हम ज्ञान को किस दृष्टि से देखते हैं और सफलता को किस अर्थ में लेते हैं। इतिहास हमें विभिन्न परिस्थितियों से सीखने का अवसर देता है, इसलिए उससे सीख लेकर वर्तमान और भविष्य के लिए दिशा तय करनी चाहिए।उन्होंने डिजिटल युग की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि “क्या चुनना है और क्यों चुनना है।” जानकारी की कमी नहीं है, बल्कि सत्य और असत्य के बीच अंतर कर सही विकल्प चुनने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है।उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए परिवर्तन को स्पष्ट रूप से समझना और कठिन परिस्थितियों में संतुलित रहने की क्षमता विकसित करना जरूरी है। शिक्षा के माध्यम से महिलाओं में विवेक, आत्मनिर्णय, जिम्मेदारी और सामाजिक सरोकार की भावना विकसित होनी चाहिए।निदेशक प्रो. गौतम सूत्रधार ने महिला शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बतायासमापन अवसर पर एनआईटी जमशेदपुर के निदेशक प्रो. गौतम सूत्रधार ने कहा, “महिला शिक्षा केवल ज्ञान और कौशल प्रदान करने का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार, मूल्यबोध और सामाजिक चेतना के निर्माण का सशक्त आधार है।

परंपरा और आधुनिकता के समन्वय के साथ भारतीय दृष्टि पर आधारित महिला शिक्षा ही सशक्त समाज और विकसित राष्ट्र की मजबूत नींव रख सकती है।”उन्होंने कहा, “ऐसे राष्ट्रीय विमर्श शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों को पुनर्परिभाषित करने और महिला शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन एवं राष्ट्र निर्माण की दिशा में अधिक प्रभावी बनाने के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।”राष्ट्रगान के साथ हुआ समापनसमापन सत्र में डॉ. शुक्ला मोहंती, पूर्व कुलपति, कोल्हान विश्वविद्यालय एवं कार्यक्रम संयोजक द्वारा सम्मेलन की व्यवस्था एवं कार्यप्रगति का परिचय प्रस्तुत किया गया।

अध्यक्षीय उद्बोधन के पश्चात श्री विजय कुमार सिंह, क्षेत्र संयोजक, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने धन्यवाद ज्ञापन किया।अंत में राष्ट्रगान के साथ दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का औपचारिक समापन हुआ।दो दिनों तक चले इस राष्ट्रीय विमर्श में यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि महिला शिक्षा को ज्ञान के साथ संस्कार, भारतीय दृष्टि, विवेक, मूल्यबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व और नेतृत्व से जोड़ना आवश्यक है। आधुनिकता और परंपरा के संतुलित समन्वय से ही महिला शिक्षा को अधिक प्रभावी एवं समाजोपयोगी बनाया जा सकता है।

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