चले थे चौबे से छब्बे बनने, दुबे भी ना रहे……
मानगो नगर निगम चुनाव की घोषणा होने के साथ ही अपने राजनीतिक जीवन की बुझी हुई राख में अपनी दबी हुई महत्वाकांक्षा की चिंगारी ढूंढते हुए कई लोग अपने सीने पर ही ढोलक रखकर बजाने लगे।
जमशेदपुर महानगर का दो बार जिला अध्यक्ष रह चुके राजकुमार श्रीवास्तव भी उन्हीं कुछ लोगों में शामिल थे।
मानगो मेयर की सीट महिला के लिए आरक्षित होने की घोषणा के साथ ही राजकुमार श्रीवास्तव ने मेयर सीट की प्रत्याशी के तौर पर अपनी पत्नी कुमकुम श्रीवास्तव के नाम का ऐलान कर दिया।
यह और बात है कि अपने पूरे राजनीतिक जीवन में इनकी पहचान झारखंड राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी होने के अलावा और कुछ नहीं रही।
राजकुमार श्रीवास्तव मानगो के निवासी होने के बावजूद मानगो की जनता की समस्याओं को लेकर सार्वजनिक रूप से किनारा करते हुए अपनी जिंदगी जीते रहे ।
इनको ना कभी किसी धरना प्रदर्शन में देखा गया, ना ही जनआंदोलन में देखा गया और ना कभी मानगो के निवासियों की समस्याओं के समाधान के लिए निजी रूप से पहल करते देखा गया।
राजकुमार श्रीवास्तव के कथनानुसार वे सात-सात पेट्रोल पंप के मालिक हैं ।खुद को आर्थिक रूप से मजबूत भी बताया, परंतु बात जब चुनावी खर्च की आई तो दुम दबाकर भाग खड़े हुए।
इनको भरोसा था कि उनकी पत्नी को भाजपा का समर्थन मिलेगा और उसी के साथ पार्टी की ओर से चुनावी फंड भी मिलेगा।
परंतु एनडीए के द्वारा नीरज सिंह की पत्नी संध्या सिंह को समर्थन दिया जाने के साथ ही उनकी महत्वाकांक्षाओं के पंख जाम हो गए।
पार्टी से बगावत कर अपना प्रत्याशी खड़ा करने के कारण यह बीजेपी से निलंबित भी हो गए। दोहरी मार झेल रहे राजकुमार श्रीवास्तव की ऐसी स्थिति हो गई कि पत्रकारों से किए हुए वादों को पूरा करने के लिए भी अपने दयनीय आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए दिखाई दिए।
कोढ पर खाज यह हुआ कि कल मतगणना स्थल पर काऊ केचर में अपना पैर फंसा कर खुद को बिस्तर पर बेड रेस्ट के रूप में पाया।
कुल मिलाकर ऐसे ही स्थितियों के लिए कहा गया है–
चले थे चौबे से छब्बे बनने
दुबे भी ना रहे…
अपनी पत्नी को मानगो मेयर का दमदार प्रत्याशी बताकर मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले राजकुमार श्रीवास्तव की पत्नी कुमकुम श्रीवास्तव को कुल जमा 1889 वोट ही पड़े।

