झारखंड को और जमशेदपुर पूर्वी को जरूरत है रघुवर दास की…..
झारखंड विधानसभा चुनाव 2024 को मात्र 2 महीने रह गए हैं और अभी तक यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि जमशेदपुर पूर्वी से भाजपा का उम्मीदवार कौन होगा। 2019 के विधानसभा चुनाव में जमशेदपुर पूर्वी ने एक बड़ा उलटफेर देखा जब 1995, 2000, 2004, 2009 और 2014 के भाजपा से विधायक यानी कि पूरे 25 वर्षों तक जमशेदपुर पूर्वी के विधायक रहे, झारखंड सरकार के कई विभागों में मंत्री रहे, प्रदेश अध्यक्ष रहे, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे, और 2019 से 2019 तक झारखंड के मुख्यमंत्री रहे रघुवर दास को निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जमशेदपुर पूर्वी से चुनाव लड़े सरयू राय ने पराजित कर दिया ।
इस पराजय के बाद कुछ सालों तक अखबारों के सुर्खियों से दूर रहे रघुवर दास फिर चर्चा में आए जब भाजपा आलाकमान ने रघुवर दास को उड़ीसा राज्य का राज्यपाल नियुक्त कर दिया।
सोने पर सुहागे वाली बात यह हो गई की रघुवर दास के उड़ीसा के राज्यपाल बनने के बाद उड़ीसा में पहली बार भाजपा प्रचंड जीत दर्ज कर सत्ता में आई।
और इसका बहुत सारा श्रेय रघुवर दास को भी दिया गया। इसी बीच झारखंड के विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ गया और यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि जमशेदपुर पूर्वी से भाजपा का प्रत्याशी कौन होगा 2024 के विधानसभा चुनाव में?
झारखण्ड एक आदिवासी राज्य नहीं, बल्कि झारखण्ड एक OBC राज्य है। यहां की लगभग आधी आबादी OBC है, बाकि आधे में 23% आदिवासी हैं, 13 % मुस्लिम और बाकि अन्य जातियां जैसे सवर्ण, SC आदि हैं।
इसलिए ये कहना कि यह राज्य सिर्फ़ आदिवासियों के लिए बना है, सिर्फ़ आदिवासी ही मुख्यमंत्री बन सकते हैं, ये गलत और भ्रामक नैरेटिव है।
लेकिन ये एक कड़वी सच्चाई है कि OBC समाज जातियों में बंटा हुआ है। साव, तेली, बनिया, महतो, कुड़मी , गोप (यादव) आदि एकजुट नहीं हैं। जिस दिन इनमें एकता का भाव आ गया उस दिन से झारखण्ड की राजनीति बदल जाएगी।।
एक साज़िश के तहत् साव, तेली, बनिया आदि को “महाजन” बता दिया, कुड़मी को “जमींदार”… अलग झारखण्ड राज्य की लड़ाई में सवर्ण और OBC मूलवासियों का भी उतना ही योगदान है जितना आदिवासियों का।
रघुवर दास की काबिलियत या उनकी राजनीतिक पड़क पर उंगली उठाना कहीं से भी सही नहीं दिखाई देता है।
अर्जुन मुंडा भी चुनाव हारे हैं…
शिबू सोरेन भी चुनाव हारे हैं…
हेमंत सोरेन भी चुनाव हारे हैं…
सुदेश महतो भी चुनाव हारे हैं…
बाबूलाल मरांडी भी चुनाव हारे हैं…
मधु कोड़ा भी चुनाव हारे हैं…
बन्ना गुप्ता भी पहले हार चुके हैं ….
सरयू राय भी हार चुके हैं…
रघुवर दास की एक हार से जो लोग उनको जमशेदपुर पूर्वी के राजनीति से बाहर होते हुए देखना चाहते हैं उन्हें पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।
झारखंड के मुख्यमंत्री रहते हुए रघुवर दास ने नक्सली सरेन्डर पॉलिसी लाकर झारखंड से नक्सली मूवमेंट को खत्म करने में आप अप्रत्याशित सफलता पाई ।
झारखंड की महिलाओं के लिए मात्र ₹1 में रजिस्ट्री योजना लाकर रघुवर दास ने अनोखी योजना का आरंभ किया, जिससे झारखंड की लाखों महिलाएं लाभान्वित हुईं। रघुवर दास आज भी झारखंड के लिए उपयोगी हैं और खास कर जमशेदपुर पूर्वी में उनकी लोकप्रियता में पहले के मुकाबले भारी इजाफा हुआ है। और भाजपा अगर रघुवर दास को जमशेदपुर पूर्वी से टिकट देती है तो 2019 के हार का बदला जरूर चुकता करेंगे और झारखंड के राजनीति में रघुवर दास एक बार फिर से प्रासंगिक नजर आएंगे।






