दवा दुकानों में डिस्काउंट के खेल की क्या है पूरी कहानी…..?

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दवा दुकानों पर 15 से 30% छुट का बोर्ड लगाने वाले रिटेल दवा कारोबारी के खिलाफ ड्रग विभाग क्या कोई कार्यवाही करेगा ?
इस तरह के बोर्ड लगाने से ग्राहक भ्रमित हो रहे हैं। दवा कंपनियां ड्रग क विभाग के नियमों के तहत केवल 16 से 20 छूट देती हैं। ऐसे में केमिस्ट कहां से 30 फ़ीसदी तक छूट ग्राहकों को दे रहे हैं?
ऐसा प्रतीत होता है कि इतना डिस्काउंट देने वाले दुकानदार या तो अपना मुनाफा नहीं ले रहे या फिर वैकल्पिक दवाइयां ग्राहकों को दे रहे हैं।
अधिक छूट से भ्रम पैदा हो रहा है और छूट नहीं देने पर ग्राहक दुकानदार से लड़ाई पर उतारू हो जाते हैं।
छूट देने वाले दुकानदार संदेह के घेरे में हैं।
क्लियरेंस के नाम पर एक्सपायरी होने वाली दवाइयां को थोक विक्रेता खत्म करना चाहते हैं। वैसे तो दवा कंपनियां एक्सपायरी मेडिसिंस को वापस ले लेती है परंतु सबसे बड़ी बात पूंजी के फंसने का होती है।
साथ ही साथ ट्रांसपोर्टेशन का अतिरिक्त भार वहन करना पड़ता है। इसलिए थोक विक्रेता रिटेल दुकानदारों को ज्यादा डिस्काउंट देकर अपना स्टॉक क्लियर करते हैं।
दूसरे मेडिकल दुकानों के साथ कंपटीशन—
यह मनोवृति बिल्कुल आम है अगर पड़ोस का कोई दुकानदार अपने ग्राहकों को दवाइयां में छूट दे रहा है तो इसे अपने मूंछ की लड़ाई कह लें या फिर व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता -अपने मेडिकल दुकान के सामने डिस्काउंट का बोर्ड लगा देता है।
मार्जिन आफ प्रॉफिट– जब बात खुद को बचाए रखने की आती है तो मेडिकल दुकान के मालिक को मजबूरीवश अपने लाभ के मार्जिन को घटाकर डिस्काउंट का बोर्ड लगाकर व्यापार करना पड़ता है।
ऐसा नहीं करने की स्थिति में अपने व्यापार को बंद होने का डर बना रहता है।

हाकर्स का खेल…..

इस पूरे खेल में हाकर्स सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। थोक विक्रेताओं के “Dead Goods”
को यह हाई डिस्काउंट पर नगद खरीद लेते हैं।
हाकर्स मेडिकल व्यवसाय की इस पूरे इकोसिस्टम में परजीवी की भूमिका निभाते हैं। औपचारिक रूप से या परंपरागत रूप से यह इस सिस्टम का हिस्सा नहीं होते हुए भी सबसे बड़े खिलाड़ी होते हैं।
दवा कंपनी के प्रतिनिधि जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में MR यानी की मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव कहा जाता है, इन्हें अपने सालाना इंसेंटिव को हासिल करने के लिए और अपनी नौकरी को सुरक्षित बनाए रखने के लिए सेल्स का टारगेट हासिल करना होता है। उसमें विफल रहने पर यह उन दवाइयां को कम कीमत में हाकर्स को बेच देते हैं और इस नुकसान की भरपाई वह कंपनी से सालाना इंसेंटिव हासिल करके करते हैं।

दरअसल जिले के स्वास्थ्य विभाग की अपनी कुछ सीमाएं हैं, कुछ अपेक्षाएं हैं और कुछ मजबूरी भी है।
दरअसल यह सारा नेटवर्क उनकी जानकारी और मार्गदर्शन में ही चलता रहता है और उनके खामोश रहने की एक कीमत होती है जो इन्हें समय पर प्राप्त हो जाती‌ है।

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