इंडिगो प्रकरण ने केंद्र का इकबाल गिराया है…..

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इंडिगो प्रकरण ने केंद्र का इकबाल गिराया है।

यह देश तीन दिन से परेशान है। टीवी स्क्रीन पर दृश्य उभरता है कि एयरपोर्ट पर पिता बेटी के लिए पैड खरीदने को परेशान है। एक बेहतर प्रबंधन का बाहरी दस्तावेज प्रस्तुत करनेवाली कंपनी यात्रियों को, सरकार को और अन्य संस्थाओं को घुटने पर ले आती है। जैसा कि अब पढ़ने को मिल रहा है कि इंडिगो ने अपने प्रबंधन के हिसाब से कर्मियों का इंतजाम नहीं किया। ऐसे में नए नियम से उसकी हालत खराब हो गई।

यहां सवाल है कि केंद्र या राज्य सरकार किसी भी सेक्टर में मोनोपॉली सिस्टम को लागू क्यों होने देती है।मेरे हिसाब से कॉरपोरेट सेक्टर का मकसद सिर्फ और सिर्फ बेशुमार पैसा कमाना ही है। यहां समाजवाद या पूंजीवाद के मसले से अलग सामान्यवाद को तरजीह नहीं देने का मामला इस संकट का बड़ा कारण है। पायलट को आराम जरूर मिलना चाहिए, तभी वह बेहतर तरीके से विमान उड़ा पाएगा। ऐसा नहीं करने पर असुरक्षा बढ़ जाएगी।

असल में हमारा देश अचानक तरक्की तो पा गया, लेकिन खुद को बदलते वक्त के हिसाब से तैयार नहीं कर पाया। अब सरकार ने नियम बदला, तो उसमें भी अपनी केस स्टडी नहीं की। ऐसे में दबाव में आना लाजिमी है।

देश में कारपोरेट सेक्टर बेशुमार पैसा जुटा रहा है। उसे स्थाई होने का अहंकार हो जा रहा है। लेकिन यहां वह भूल जा रहा है कि उसकी बुनियाद आम लोग ही हैं। अगर आम लोग ही असुरक्षित रहेंगे, परेशान रहेंगे तो फिर परिदृश्य खराब ही होगा।कंपनियां भूल जाती हैं कि आम जनता ही सर्वोपरि है । उसकी सुरक्षा से कहीं खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।

फिलहाल इंडिगो प्रकरण ने केंद्र सरकार के इकबाल को हिला कर रख दिया है और उसकी साख पर बट्टा लगा दिया है। केंद्र सरकार को डैमेज कंट्रोल के लिए कड़ा रुख तो अख्तियार करना होगा। लेकिन एक व्यवस्था के बिगड़ने की जो नजीर दुनिया के सामने, वह भी पुतिन के आगमन पर, पेश हुई है, इसने बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है।

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"जो नहीं हो सकता वहीं तो करना है".....

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