लेह से 18 किमी दूर SECMOL नामक एक संस्थान हैं, जहां सिर्फ उन बच्चों को पढ़ाया जाता है, जो बोर्ड एग्जाम में फेल हो जाते हैं। निर्धन हो, अनाथ हो तो एडमिशन में वरीयता मिलती है। जब यह संस्थान खुला था तो लदाख में बोर्ड परीक्षा पास करने वाले बच्चे सिर्फ 5% थे, 95% फेल होते थे। इस संस्थान ने असफल बच्चों की जिम्मेदारी लेकर ‘ऑपरेशन न्यू होप” के अंतर्गत प्रशासन के साथ मिलकर नयी शिक्षा व्यवस्था लागू की और महज कुछ साल में बोर्ड परीक्षा पास करने वाले बच्चों का प्रतिशत बढ़ते-बढ़ते पहले 55 और फिर 75% हो गया।
आज इस संस्थान के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है क्योंकि इस संस्थान पर मात्र 493205 रुपए के लिए विदेशी संस्थान को “ऑर्गेनिक खेती तथा खाद्य सुरक्षा एवं संप्रभुता” से संबंधित शोध बेच देने का आरोप है।
अब आप सोचेंगे कि इसमें आपत्तिजनक क्या है तो “खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता” शब्द पर गौर फरमाइए, जिसमें “संप्रभुता” का अर्थ है – अन्न उगाने वाले पर कृषक का अधिकार। पर भारत सरकार ने इस शब्द का अर्थ “भारत की संप्रभुता” से लगा कर देशद्रोह का आरोप लगाया है। देख रहा है विनोद, कैसे शब्दों के हेरफेर से थेथरई को अंजाम दिया जाता है?
इस संस्थान पर 4 अन्य “गंभीर आरोप” हैं।
पहला – सोनम वांगचुक ने इस संस्थान को 17 लाख की बस अपनी जेब से खरीद कर दी। बाद में 3.5 लाख किसी विदेशी ने बस के लिए वांगचुक को दान दे दिए, जो सोनम ने अपने पास न रख कर स्कूल को ही दान दे दिए। आरोप है कि पैसा “विदेशी फंडिंग” के तौर पर एंट्री किया है तो सोनम के एकाउंट से क्यों क्रेडिट हुआ? कितना गंभीर अपराध है ये?
अन्य आरोप सुनिए। विदेश से 79200 रुपये लेकर एकाउंट में क्रेडिट किये बिना स्टाफ को सैलरी क्यों बांट दी? तीन लोकल लोगों ने गलती से मात्र 54000 रुपए गलत एकाउंट में ट्रांसफर क्यों किये? 19000 एक डोनर को उसकी खराब आर्थिक स्थिति के कारण वापस क्यों किया, क्योंकि पैसा वापसी का प्रावधान नहीं है। देख रहे हैं कि कितने बड़े-बड़े गंभीर आरोप लगाए हैं, ताकि दशकों से करोड़ों रुपए जेब से खर्च कर के निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध करा कर सैकड़ों बच्चों की जिंदगियां सवार चुका यह स्कूल बंद कराया जा सके।
लदाख में 2018 में वांगचुक द्वारा स्थापित एक अन्य शैक्षिक संस्थान “हयाल” (HIAL) को जमींदोज कर देने का प्रशासनिक हुक्म भी आ चुका है, जिसके दो कारण दिए गए हैं। पहला – जमीन ली तो यूनिवर्सिटी क्यों नहीं बनाई?
कितनी हास्यास्पद बात है। जा कर देखिए, HIAL की वेबसाइट पर चेक करिये। बाकायदा करोड़ों खर्च कर वहां शानदार यूनिवर्सिटी बनाई जा चुकी है। विगत कुछ सालों में 400 छात्रों की कॉन्वोकेशन हो चुकी है। यूनिवर्सिटी रजिस्टर नहीं हुई क्योंकि बकौल सोनम की पत्नी गीतांजलि, उसे केंद्रीय मंत्री द्वारा साफ चेतावनी दी गयी कि जब तक छठी सूची की मांग नहीं छोडोगो, मान्यता नहीं मिलेगी।
दूसरा आरोप – एक वर्ष के भीतर लैंड डीड क्यों नहीं कराई? कमेंट में सबूत देख लीजिए कि लैंड डीड की एप्लीकेशन के जवाब में 19-02-2021 को लदाख के DC ने लिखित उत्तर दिया कि – नयी यूनियन टेरीटरी की नीतियां अभी निर्धारित हो रही हैं, थोड़ा समय दीजिये और काम जारी रखिये। इसी साल 25 मार्च को तहसीलदार ने काम जारी रखने के लिए “Non Encumbrance Certificate” लागू किया। जब एक वर्ष अर्थात 2019 तक लैंड डीड रजिस्टर न होने के कारण आवंटन निरस्त हो गया था तो दो साल बाद 2021 में लेटर इशू कर के तुम अपने बैंड बजा रहे थे? आज जब करोड़ों रुपए खर्च कर भवन बन गया, बच्चे पढ़ रहे थे – तब तुम नींद से जाग कर आज बच्चों के भविष्य पर बुलडोजर चलाने निकले हो? चुल्लू भर पानी हो तो….
उपरोक्त आरोपों के अलावा जो आप डेढ़ करोड़ का ट्रांसफर, दो करोड़ का ट्रांसफर सुन रहे हैं, वे सब “सूत्रों के हवाले से” लगाये गए फर्जी आरोप हैं। उनमें आपत्तिजनक न कुछ न था, न आगे मिलेगा। उनके उत्तर दिए जा चुके हैं।
सोचिए, चुनावी मेनिफेस्टो में दो बार लदाख को छठी अनुसूची का वादा कर के बाद में ठगा गया। राजनीतिक रंजिश में तुम लदाख के बच्चों के भविष्य को संवारने वाले संस्थानों पर बदले की कार्यवाही करना चाहते हो। लदाख वाले अपने हक के लिए हजारों किमी पैदल चले, आंदोलन किया, सत्याग्रह किया, भूखे रहे। आज जब 14 दिन से लोग आमरण अनशन पर बैठे थे और उनमें से दर्जनों लोगों को तबियत बिगड़ने के कारण अस्पताल ले जाना पड़ा। वे अन्याय के खिलाफ प्राणोत्सर्ग के लिए तैयार थे – पर अनशन तोड़ने को नहीं। तब सरकार का जवाब आया कि वे 6 अक्टूबर को इन लोगों से एक बार मीटिंग करेंगे – यानी 15 दिन बाद।
अगले 15 दिन लदाख में कोई जिये या मरे – 18 घण्टे काम में व्यस्त सरकार में किसी के पास इतना समय नहीं कि अपनी जान देने पर आमादा उन बेचारों से मिल तक ले। गुस्सा कैसे नहीं भड़केगा? जो हुआ, नहीं होना था। पर जिसने क्रूरता और अन्याय की पराकाष्ठा पार कर लदाख को इस स्थिति तक पहुंचाया – वो बराबर का जिम्मेदार कैसे नहीं हुआ?
अपने देशप्रेम की परिभाषा पर दोबारा विचार करिये। लदाख अथवा इस देश के किसी भी नागरिक पर होते अत्याचार के खिलाफ खड़ा होने वाला और उनके हक के लिए आवाज उठाने वाला अगर देशद्रोही है तो मुझे लगता है कि इस देश को आज देशप्रेमियों से कहीं ज्यादा देशद्रोहियों की जरूरत है।


