
नेशनल_हेराल्ड फैसला: #क़ानून की सीमाओं की पुनर्स्थापना
नेशनल हेराल्ड मामले में आया हालिया न्यायिक फैसला किसी परिवार या दल के पक्ष में दिया गया आदेश नहीं है। यह फैसला जाँच एजेंसियों की बढ़ती निरंकुशता पर एक संवैधानिक ब्रेक है।
इस मामले की बुनियाद ही असामान्य थी। यह कोई FIR से जन्मा आपराधिक मामला नहीं, बल्कि एक व्यक्ति द्वारा दायर प्राइवेट ज्यूडिशियल कम्प्लेंट थी। कानून की दृष्टि से यह फर्क निर्णायक होता है, क्योंकि #मनीलॉन्ड्रिंग कानून (#PMLA) तभी लागू हो सकता है जब कोई वैध, दर्ज आपराधिक अपराध (scheduled offence) मौजूद हो। इसके बावजूद #प्रवर्तननिदेशालय ने बिना किसी स्वतंत्र #first के जाँच शुरू की, चार्जशीट दाख़िल की और जब्ती की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार का प्रयोग नहीं, अधिकार का अतिक्रमण है। #ईडी कानून से ऊपर नहीं है।
इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बना दिया दिल्ली पुलिस की वह FIR, जो ईडी की चार्जशीट के आधार पर और संसद सत्र से ठीक पहले दर्ज की गई। यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था को उलटने जैसा था — पहले चार्जशीट, फिर FIR।
अदालत ने न किसी की नीयत पर फैसला दिया, न राजनीतिक टिप्पणी की। उसने सिर्फ़ इतना कहा कि कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग हुआ है, और लोकतंत्र में प्रक्रिया ही न्याय की रीढ़ होती है।
यह फैसला याद दिलाता है कि
राज्य शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन कानून के बाहर नहीं।
और यही किसी भी लोकतंत्र की आख़िरी गारंटी है।


