शोषित और वंचित वर्ग के लिए आवाज उठाने वाले भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा के बगल में ही खुलेआम हो रहा गरीबों का शोषण…..
झारखंड की माटी में जन्म लेकर इस माटी को अपने साहसिक और पुनीत कार्यों से सौभाग्य प्रदान करने वाले धरती आबा, जननायक भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा 3 वर्षों पहले साकची आई हॉस्पिटल के सामने वाले पार्क में स्थापित की गई।
इसका उद्देश्य था कि वर्तमान पीढ़ी इस जननायक के आदर्शों को समझ सके और उनके आदर्शों पर चलकर उनके गौरवगाथा को घर-घर पहुंचाया जा सके।
इस जननायक की प्रतिमा जहां स्थापित की गई है, वहां से मात्र 50 मीटर की दूरी पर जमशेदपुर अधिसूचित क्षेत्र समिति यानी की जेएनएसी के द्वारा साकची बाजार को जाम मुक्त करने हेतु एक पार्किंग स्थल को टाटा स्टील के सहयोग से विकसित किया गया।
क्रमवार इस पार्किंग स्थल की बोली लगवाई गई ताकि बाजार को जाम मुक्त रखने के साथ-साथ सरकारी राजस्व को भी हासिल किया जा सके। वर्तमान में इस पार्किंग स्थल की नीलामी के बाद ठेका हासिल करने वाली “शैल कंस्ट्रक्शन” नामक कंपनी (जिसके कर्ताधर्ता आशुतोष सिंह और राजेश सिंह हैं )यहां पार्किंग का काम संभालते हैं।
शहर के सबसे बड़े गोरखधंधे की शुरुआत यहीं से होती है। इस विशाल भूखंड में भोर के 4:00 बजे से लेकर दोपहर के 12:00 बजे तक शहरी सीमा से सटे ग्रामीण इलाकों जैसे की पटमदा ,कटिंग, बोड़ाम, चांडिल, हाता, डिमना लेक के आसपास के ग्रामीणों सहित कई गरीब दो पैसे कमाने की चाहत में अपने-अपने खेतों में उगी हुई सब्जियों को लेकर बेचने आते हैं।
यहां आने के बाद इनका सामना होता है ठेकेदार द्वारा पाले गए महिषासुरों से।
खून चूसने की हद तक शोषण की प्रक्रिया चलती रहती है। पार्किंग स्टैंड में सब्जी बेचने की एवज में गरीबों से ₹500 की अवैध वसूली रंगदारी के रूप में होती है।
साथ ही जिन वाहनों में लादकर ये गरीब अपनी सब्जियों को शहर में लाते हैं, उन वाहनों से अतिरिक्त शुल्क के रूप में ठेकेदार के पाले हुए गुंडो द्वारा वसूला जाता है।
रंगदारी के रूप में प्रतिदिन वसूली गई यह रकम ₹80000/- के करीब होती है और मासिक यह रकम 20 से 25 लाख रुपए के करीब होती है।
सालाना रूप में देखने पर रंगदारी के तौर पर वसूली गई यह रकम करीब पौने तीन करोड रुपए के आसपास होती है।
सूत्रों ने बताया कि इस अवैध उगाही का कुछ हिस्सा संबंधित विभाग सहित संबंधित थाना तक भी पहुंचता है। अपना खून पसीना लगाकर अपने खेतों में उगाई गई सब्जियों को बेचने के बदले सामंती व्यवस्था के तहत इनका पुरजोर शोषण हो रहा है। इन गरीबों का शोषण होते देखना भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा की नियति बन गई है।
काश की धरती आबा आज जीवित होते और इस सामंतवादी व्यवस्था की कोख से जन्मे ऐसे अराजक लोगों के खिलाफ भी एक नया उलगुलान छेड़ते।



