लगातार हो रहे सड़क हादसों के खिलाफ मशाल जुलूस, रघुवर दास के कार्यकाल पर भी उठे सवाल, प्रदर्शन को लेकर सियासी बहस तेज—समर्थकों ने ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार की मांग की, विरोधियों ने पूछा: लंबे कार्यकाल में स्थायी समाधान क्यों नहीं?

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लगातार हो रहे सड़क हादसों के खिलाफ मशाल जुलूस, रघुवर दास के कार्यकाल पर भी उठे सवाल, प्रदर्शन को लेकर सियासी बहस तेज—समर्थकों ने ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार की मांग की, विरोधियों ने पूछा: लंबे कार्यकाल में स्थायी समाधान क्यों नहीं?

जमशेदपुर।

शहर में लगातार हो रहे सड़क हादसों और ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इसी मुद्दे को लेकर जमशेदपुर में मशाल जुलूस निकाला गया। तस्वीरों में बड़ी संख्या में लोग हाथों में मशाल लेकर सड़क पर मार्च करते दिखाई दे रहे हैं।

इस बीच इस प्रदर्शन को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री और जमशेदपुर पूर्वी के पूर्व विधायक रघुवर दास के राजनीतिक कार्यकाल पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। रघुवर दास 1995 से 2019 तक जमशेदपुर पूर्वी से विधायक रहे और 2014 से 2019 तक झारखंड के मुख्यमंत्री रहे।

प्रदर्शन की पृष्ठभूमि में आलोचकों का कहना है कि लगभग 25 वर्षों तक जमशेदपुर पूर्वी का प्रतिनिधित्व करने और पांच वर्ष तक राज्य के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद शहर की ट्रैफिक समस्या के स्थायी समाधान के लिए फ्लाईओवर, रिंग रोड और व्यापक ट्रैफिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे मुद्दों पर अपेक्षित परिणाम नहीं दिखाई दिए।

हालांकि, यह राजनीतिक आलोचना है; उपलब्ध स्रोतों से यह स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं होता कि उनके कार्यकाल में इन सभी परियोजनाओं के लिए कोई प्रयास ही नहीं हुआ।हाल के दिनों में जमशेदपुर में सड़क हादसों ने ट्रैफिक व्यवस्था और भारी वाहनों के आवागमन को लेकर चिंता बढ़ाई है। 13 सितंबर 2026 को सिदगोड़ा के एग्रिको ट्रैफिक सिग्नल के पास हुए हादसे में पिता-पुत्र की मौत के बाद भी लोगों ने ट्रैफिक व्यवस्था और नो-एंट्री में भारी वाहनों के प्रवेश को लेकर विरोध जताया था।

मशाल जुलूस ने खड़ा किया सियासी सवाल

मशाल जुलूस को लेकर अब सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर आज शहर की बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था और सड़क हादसों के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है, तो लंबे समय तक सत्ता और स्थानीय प्रतिनिधित्व में रहने के दौरान इन समस्याओं के स्थायी समाधान को लेकर क्या-क्या कदम उठाए गए थे?

दूसरी ओर, प्रदर्शन का उद्देश्य और आयोजकों की ओर से रखी गई मांगों को उनके आधिकारिक बयान के आधार पर देखा जाना जरूरी है। हादसों पर राजनीति से अलग शहरवासियों की मुख्य चिंता सड़क सुरक्षा, ट्रैफिक प्रबंधन और सुरक्षित आवागमन को लेकर है।

सवाल सिर्फ मशाल जलाने का नहीं, बल्कि शहर की सड़कों को सुरक्षित बनाने की जवाबदेही का भी है।

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"जो नहीं हो सकता वहीं तो करना है".....

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