धर्मसंकट में फंसे एन. चंद्रबाबू नायडू!
उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक ने बी सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाकर बड़ा ‘खेला’ कर दिया है. अब केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल टीडीपी और उसके मुखिया चंद्रबाबू नायडू के सामने बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया है. दरअसल, इस बार उपराष्ट्रपति पद का चुनाव क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरणों के चलते बेहद दिलचस्प हो गया है. इंडिया गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को अपना उम्मीदवार घोषित किया है, जो आंध्र प्रदेश के रंगारेड्डी ज़िले से ताल्लुक रखते हैं. ‘इंडिया’ के इस दांव से सियासी हलचल बढ़ गई है.
कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने कहा कि गठबंधन ने सर्वसम्मति से उनका नाम तय किया है. वे उम्मीद जता रहे हैं कि कम से कम इंडिया गठबंधन के दलों का वोट तो उन्हें मिलेगा ही. साथ ही आंध्र के दलों को लेकर भी दांव खेला जा रहा है कि उनका भी सपोर्ट मिल जाए. लेकिन सवाल उठता है कि क्या ऐसा संभव है? दूसरा सवाल यह भी है कि जब विपक्ष को पता ही था कि चुनाव में उम्मीदवार खड़ा करना प्रतीकात्मक ही है तो फिर कोई और कैंडिडेट खड़ा क्यों नहीं किया? बी सुदर्शन रेड्डी एक राजनीतिक नाम नहीं हैं. जाहिर है कि उनके नाम से कोई राजनीतिक संदेश भी आम लोगों के बीच नहीं जाने वाला है. सुदर्शन रेड्डी का मुकाबला एनडीए गठबंधन के कैंडिडेट सीपी राधाकृष्णन से होगा. दोनों उम्मीदवार 21 अगस्त को अपना नामांकन दाखिल करेंगे. आइये देखते हैं कि सुदर्शन रेड्डी का नाम आगे बढ़ाकर इंडिया गठबंधन ने क्या हांसिल कर पाएगा.
दूसरी ओर, एनडीए ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को मैदान में उतारा है, जो तमिलनाडु से ताल्लुक रखते हैं. दोनों उम्मीदवारों के क्षेत्रीय मूल ने इस चुनाव को एक दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. इससे एनडीए गठबंधन के सहयोगियों खासकर तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) के लिए दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है. सुदर्शन रेड्डी की विपक्ष की ओर से उम्मीदवारी हालांकि गठबंधन की एकता को दर्शाता है, लेकिन राजनीतिक संदेश के मामले में कमजोर नजर आता है. रेड्डी सवर्ण हैं. ऐसे में वे विपक्ष की दलित-ओबीसी राजनीति के एजेंडे में मिस फिट नजर आते हैं. वहीं, भाजपा और एनडीए की ओर से सीपी राधाकृष्णन की उम्मीदवारी को ओबीसी, किसान परिवार और दक्षिण भारत के प्रतिनिधि के रूप में प्रचारित किया जा रहा है.
टीडीपी एनडीए की एक प्रमुख सहयोगी है. इसके प्रमुख और मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू अब क्षेत्रीय गौरव और गठबंधन की निष्ठा के बीच फंस गए हैं. चूंकि सुदर्शन रेड्डी आंध्र प्रदेश से हैं, इसलिए टीडीपी पर अपने राज्य के नेता का समर्थन करने का दबाव बढ़ गया है. अगर वह ऐसा नहीं करते हैं तो जनता के बीच ग़लत मैसेज भी जा सकता है. राजनैतिक जानकारों का मानना है कि अगर चंद्रबाबू नायडू एनडीए के उम्मीदवार यानी सीपी राधाकृष्णन का समर्थन करते हैं तो उनकी क्षेत्रीय राजनीति को भारी नुकसान पहुंच सकता है. जबकि टीडीपी और चंद्रबाबू नायडू के लिए प्रदेश की राजनीति केन्द्र की सियासत से कहीं ज्यादा अहम है.
वहीं, दूसरी तरफ यदि वह ‘इंडिया ब्लॉक’ के उम्मीदवार बी सुदर्शन रेड्डी का सपोर्ट करते हैं तो यह सीधे तौर पर केन्द्र की मोदी सरकार से बगावत मानी जाएगी. वहीं, चंद्रबाबू के ऐसा करने पर केन्द्र की मोदी सरकार को कमजोर होते देख एनडीए में शामिल अन्य दल भी अपना रुख बदल सकते हैं. एनडीए के पास मौजूदा वक्त में 293 लोकसभा सांसद हैं. अगर चंद्रबाबू नायडू पाला बदलते हैं तो यह संख्या 277 रह जाएगी. बहुमत में बने रहने के लिए 272 सांसद जरूरी हैं. ऐसे में टीडीपी के टूटने के बाद मोदी सरकार पर ख़तरा बढ़ जाएगा. फिलहाल यह सियासी विश्लेषकों और राजनैतिक चर्चाओं का हिस्सा है. आगे क्या कुछ होता है यह देखना काफी दिलचस्प होगा.
तेलंगाना की सोशल इंजीनियरिंग में बी. सुदर्शन रेड्डी का बड़ा रोल रहा है. तेलंगाना सरकार ने 2023 के विधानसभा चुनावों में किए गए वादे के तहत सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक, रोजगार, राजनीतिक और जातिगत सर्वेक्षण शुरू किया था. इस सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण करने और इसकी सटीकता सुनिश्चित करने के लिए एक विशेषज्ञ पैनल का गठन किया गया जिसकी अध्यक्षता बी. सुदर्शन रेड्डी ने की थी. इस पैनल का मुख्य उद्देश्य था कि सर्वेक्षण में एकत्र किए गए डेटा में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी न हो. इसके अलावा इस पैनल की यह भी जिम्मेदारी थी कि वह यह सुनिश्चित करे कि आंकड़े विश्वसनीय, पारदर्शी और नीति निर्माण के लिए उपयोगी हों. पर खुद ओबीसी न होने के चलते सुदर्शन रेड्डी कभी भी ओबीसी नेता की कमी को पूरा नहीं कर सकेंगे. जैसा पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन लागू तो किया पर उनके साथ देश का ओबीसी समुदाय आज तक खड़ा नहीं हुआ. हालांकि उन्होंने एक ऐसा महत्वपूर्ण काम किया है जिसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी सरकार बनने पर पूरे देश में लागू करना चाहते हैं. राहुल गांधी चाहते हैं कि तेलंगाना के मॉडल पर पूरे देश में जातिगत जनगणना हो. जाहिर है कि ऐसी योजना से जुड़े किसी व्यक्ति को हारने वाली लड़ाई में जानबूझकर शहीद करना किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं है. सुदर्शन रेड्डी की अगर ब्रैंडिंग करनी थी तो उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष या इसी तरह की किसी और पद से सुशोभित किया जाना चाहिए था.
उपराष्ट्रपति पद के लिए कैंडिडेट घोषित करने के बाद विपक्ष का कहना है कि हमारा उम्मीदवार संविधान से जुड़ा हुआ कैंडिडेट है, पर उनका आरएसएस कैंडिडेट है. इंडिया गठबंधन द्वारा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी. सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाकर देश के सामने न्यायपालिका की निष्पक्ष छवि को बढ़ावा देने वाली पार्टी बनने की कोशिश की गई है. यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस को उम्मीद है कि इस चयन के जरिए न्यायपालिका के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर (सहानुभूति या समर्थन) हासिल कर पाएगी. पर ऐसा कभी नहीं हुआ है. विपक्ष ने कई बार राष्ट्रपति पद के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस को हारने के लिए खड़ा किया पर इससे कभी कोई फायदा नहीं हुआ है. सिवाय कि ऐसे कैंडिडेट को राष्ट्रीय स्तर पर कुछ दिन चर्चा में रहने को मिल जाता है. रेड्डी का चयन न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने का संदेश देता है, लेकिन यह शहरी और शिक्षित मतदाताओं तक सीमित है. CSDS-Lokniti के सर्वे के अनुसार, बिहार में 60% मतदाता आर्थिक मुद्दों, जैसे बेरोजगारी और पलायन, को प्राथमिकता देते हैं. न्यायपालिका से संबंधित मुद्दे, जैसे संवैधानिक रक्षा, ग्रामीण और कम शिक्षित मतदाताओं के लिए शायद बिल्कुल भी प्रासंगिक नहीं है. रेड्डी की उम्मीदवारी को सुप्रिया श्रीनेत संवैधानिक मूल्यों से जोड़ती हैं पर यह भाजपा के ओबीसी नरेटिव को तोड़ने में कहीं से भी वे कारगर नहीं दिख रहे हैं.



