नेपाल की नई प्रधानमंत्री सुशीला कार्की : न्याय से राजनीति तक की यात्रा..

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नेपाल की नई प्रधानमंत्री सुशीला कार्की : न्याय से राजनीति तक की यात्रा

नेपाल की राजनीति फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां निष्पक्षता और नैतिकता की कसौटी पर खरे उतरने वाले व्यक्तित्व की तलाश थी। इस दौर में नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रहीं सुशीला कार्की का नाम सामने आया है। राजनीतिक अस्थिरता के बीच नेपाल के युवा आंदोलन “Gen Z” ने उन्हें अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तावित किया है। साढ़े सात हजार प्रतिभागियों में से उन्हें 3543 वोट मिले हैं। जज के रूप में उनका कार्यकाल भ्रष्टाचार-विरोधी कठोर फैसलों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जाना जाता है। साहित्यिक मिजाज की सुशीला कार्की ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। उनका सफर उस नारी शक्ति का प्रतीक है जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी न्याय और सत्य का पक्ष लिया। जब वह नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री बनने की ओर अग्रसर हैं तो यह सिर्फ राजनीति का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए नैतिकता, न्याय और पारदर्शिता का सफर है।

7 जून 1952 को विराटनगर में जन्मी सुशीला अपने माता-पिता की सात संतानों में सबसे बड़ी हैं। महेंद्र मोरंग परिसर से स्नातक, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए (1975) और त्रिभुवन विश्वविद्यालय (काठमांडू) से एलएलबी (1978) की डिग्री ने उनके व्यक्तित्व को बौद्धिक गहराई प्रदान की। बनारस में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात दुर्गा प्रसाद सुबेदी से हुई, जिनसे बाद में उन्होंने विवाह किया। सुबेदी नेपाली कांग्रेस के लोकप्रिय नेता थे और उन्हें कभी पंचायत शासन के विरुद्ध आंदोलनों और विमान अपहरण प्रकरण के लिए भी जाना गया।

न्यायिक करियर

सुशीला कार्की ने 1979 में वकालत शुरू की और 2007 में वरिष्ठ अधिवक्ता बनीं। 22 जनवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त हुईं, जहां अप्रैल 2016 से जुलाई 2016 तक कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की भूमिका निभाई और 11 जुलाई 2016 को नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।

विवाद और दृढ़ता

30 अप्रैल 2017 को तत्कालीन माओवादी केंद्र और नेपाली कांग्रेस ने उनके खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया, लेकिन जनता के तीव्र विरोध और सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश ने संसद को रोक दिया। यह न केवल उनकी व्यक्तिगत जीत थी, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का भी संरक्षण था।

साहित्यिक योगदान

उनका साहित्यिक संसार भी समृद्ध है। 2018 में उनकी आत्मकथा “न्याय” प्रकाशित हुई, जिसमें उनके संघर्ष और अनुभवों की झलक है। 2019 में प्रकाशित उपन्यास “कारा”, विराटनगर जेल की पृष्ठभूमि में लिखा गया है, जहां उन्हें कभी बंदी बनाया गया था।

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