क्या हुआ जब झामुमो का हुआ भाजपा के साथ बेमेल गठबंधन…..

1 min read

2009 के झारखंड विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। इस चुनाव में झामुमो का कांग्रेस से गठबंधन नहीं हुआ था। कांग्रेस ने बाबूलाल मरांडी की पार्टी, झारखंड विकास मोर्चा के साथ मिल चुनाव लड़ा था। दूसरी तरफ भाजपा और जदयू ने मिल कर चुनाव लड़ा था। झामुमो को 18, भाजपा को 18, कांग्रेस को 14, झारखंड विकास मोर्चा को 11, आजसू को 5, राजद को 5 और जदयू को 2 सीटें मिलीं थी। अन्य छोटे दलों और निर्दलीय मिलाकर 8 विधायक जीते थे। पहले बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री बनने की रेस में थे। लेकिन वे बहुमत नहीं जुटा सके। इसके बाद शिबू सोरेन ने सरकार बनाने के लिए कांग्रेस से समर्थन मांगा। लेकिन सहयोगी बाबूलाल के विरोध के कारण कांग्रेस पीछे हट गई। फिर भाजपा, कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए बिसात बिछाने लगी।

अंत में भाजपा ने धुर विरोधी शिबू सोरेन को समर्थन देने का फैसला कर लिया। भाजपा के 18, झामुमो के 18, जदयू के 2, आजसू के 5 और 3 निर्दलीय विधायकों समर्थन से शिबू सोरेन ने 46 आंकड़ा जुटा लिया जो बहुमत से 5 अधिक था। इस तरह शिबू सोरेन और भाजपा की सरकार बन गई। भाजपा के रघुवर दास और आजसू के सुदेश महतो उपमुख्यमंत्री बने।

अप्रैल 2010 में विपक्ष (भाजपा और अन्य) ने केन्द्र सरकार के खिलाफ कटौती प्रस्ताव पेश किया था। इस पर मतदान के समय शिबू सोरेन की पार्टी झामुमो ने केन्द्र सरकार का समर्थन कर दिया। उस समय केन्द्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी। झारखंड में भाजपा के सहयोग से शिबू सोरेन की सरकार चल रही थी। यानी उस समय झारखंड में भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का गठबंधन था। लेकिन केन्द्रीय राजनीति में झामुमो ने भाजपा से अलग होकर कांग्रेस (मनमोहन) सरकार का समर्थन कर दिया। इससे भाजपा नाराज हो गई। तब भाजपा संसदीय दल के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी नेतृत्व में पार्टी के शीर्ष नेताओं की बैठ हुई। इस बैठक में भाजपा ने शिबू सोरेन सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला किया। लेकिन सरकार गिरी नहीं थी।

28-28 महीने की सरकार पर डील
फिर भाजपा के रुख में नरमी आ गई। उसने शर्त रख दी कि सरकार तो रहेगी लेकिन मुख्यमंत्री उसकी पार्टी का होगा। इस बीच सौदेबाजी की राजनीति चलती रही। 18 मई 2010 को शिबू सोरेन ने घोषणा की कि झामुमो और भाजपा के नेतृत्व में बारी-बारी से 28 -28 महीने की सरकार बनेगी। इस समझौते के तहत पहले भाजपा को सरकार बनानी थी। 25 मई को भाजपा के नेतृत्व में नयी सरकार का गठन होना था। लेकिन इसी बीच 21 मई को शिबू सोरेन ने पलटी मार दी। उन्होंने कहा, मैंने 5 साल के लिए सरकार बनाई है, बीच में मुझे कौन हटा सकता है। उन्होंने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया।

भाजपा ने शिबू सोरेन सरकार गिरा दी
शिबू सोरेन की वादाखिलाफी से नाराज भाजपा ने 24 मई 2010 को सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिरा दी। भाजपा के 18 विधायक कम होने से शिबू सोरेन सरकार के पास सिर्फ 25 विधायकों का ही समर्थन रह गया था। सरकार अल्पमत में आ गई। राज्यपाल ने शिबू सोरेन को 31 मई तक सदन में बहुमत साबित करने का निर्देश दिया। छह दिनों तक शिबू सोरेन ने कांग्रेस और बाबूलाल मरांडी से समर्थन लेने की जी-तोड़ कोशिश की। लेकिन दोनों दल समर्थन के लिए राजी नहीं हुए। तब शिबू सोरेन जान गए कि अब वे किसी हाल में बहुमत साबित नहीं कर सकते। इसलिए विश्वास मत से एक दिन पहले ही उन्होंने, यानी 30 मई 2010 को, मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। नतीजे के तौर पर राष्ट्रपति शासन लगा गया, लेकिन विधानसभा भंग नहीं हुई।

4 महीने बाद भाजपा की पलटी, झामुमो के समर्थन से CM
राष्ट्रपति शासन के दौरान सरकार बनाने के लिए फिर खिचड़ी पकने लगी। एक बार फिर असंभव, संभव हुआ। जिस शिबू सोरेन ने चार महीना पहले भाजपा को सत्ता देने से इंकार कर दिया था, वे एक बार फिर पलट गए। सितम्बर 2010 में उन्होंने भाजपा की नेतृत्व वाली सरकार पर हामी भर दी। 11 सितम्बर 2010 को भाजपा के अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने उन्हें समर्थन दिया। इस तरह दोनों धुर विरोधियों ने एक दूसरे का नेतृत्व स्वीकार कर लिया। ये आश्चर्य की बात है जब शिबू सोरेन को भाजपा का मुख्यमंत्री स्वीकार करना ही था तो उन्होंने मई 2010 में क्यों नहीं किया? बेवजह राज्य में चार महीने तक राष्ट्रपति शासन लगाने की नौबत ला दी। अर्जुन मुंडा का मुख्यमंत्री बनना भी भाजपा के लिए शर्मनाक था। धोखा खाने के बाद भी वो शिबू सोरेन के साथ जाने के लिए तैयार हो गई। इसी शर्म की वजह से शपथ ग्रहण समारोह में राजनाथ सिंह को छोड़ कर भाजपा का कोई वरिष्ठ नेता नहीं आया था।

SPY POST https://spypost.in/

राजनीति और सामाज के अंदर तक घुसपैठ कर चुके विषैले विषाणुओं को मारने वाला किटाणुनाशक....
एडवेंचर पत्रकारिता से प्यार और किसी भी कीमत पर सच सामने लाने की जिद.....
"जो नहीं हो सकता वहीं तो करना है".....

You May Also Like

More From Author