शिक्षा के मंदिर को बना दिया ‘किराना स्टोर’, कापी किताबों और फोल्डर के नाम पर आफिशियल डकैती’…..

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शिक्षा के मंदिर को बना दिया ‘किराना स्टोर’, कापी किताबों और फोल्डर के नाम पर आफिशियल डकैती…..

नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही माता-पिता के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई देने लगती हैं। बच्चों की अगली कक्षा में जाने की खुशी से कहीं ज्यादा भारी होता है उनके स्कूल का ‘खर्चा।

आज के दौर में निजी स्कूलों की फीस तो आसमान छू ही रही है, लेकिन उससे भी बड़ी समस्या बन गई है स्कूलों की वो जबरदस्ती, जहां किताबों और यूनिफॉर्म के साथ-साथ अब पेंसिल, इरेजर और कॉपियों जैसी छोटी स्टेशनरी भी स्कूल से ही खरीदने पर मजबूर किया जाता है। क्या यह शिक्षा का प्रसार है या फिर कमीशन का खेल?

कई बड़े और नामी स्कूलों ने शिक्षा को ‘मॉल’ बना दिया है। माता-पिता को ऑप्शन देने के बजाय उन्हें एक खास दुकान या स्कूल के ही काउंटर से सामान लेने के लिए कहा जाता है। तर्क दिया जाता है कि इससे समानता बनी रहेगी, लेकिन असलियत में यह स्कूलों और सप्लायर्स के बीच के मोटे कमीशन का खेल होता है। जब एक अभिभावक बाहर से वही सामान सस्ते में खरीद सकता है तो उसे स्कूल की ‘दादागिरी’ सहने पर क्यों मजबूर किया जाता है?

किताबों और यूनिफॉर्म के बाद अब स्टेशनरी का नंबर…..

पहले यह मोनोपॉली स्कूल यूनिफॉर्म और खास पब्लिशर्स की किताबों तक ही सीमित थी।लेकिन अब स्कूल एक कदम आगे निकल गए हैं। अब स्कूल के लोगो (Logo) वाली कॉपियां, खास ब्रांड के पेन और यहां तक कि कवर चढ़ाने वाले कागज भी स्कूल से ही लेने होते हैं। बाहर की दुकान पर जो कॉपी 40 रुपये की मिल सकती है, स्कूल काउंटर पर उसकी कीमत 60 से 80 रुपये तक वसूल ली जाती है। अभिभावकों का आरोप है कि यह सीधे तौर पर उनकी जेब पर डकैती है।

इसका समाधान क्या है?

स्कूलों की लूट को रोकने के लिए केवल सरकारी आदेश काफी नहीं हैं। पेरेंट्स एसोसिएशन को पहले से भी ज्यादा एक्टिव होना होगा। स्कूलों को पारदर्शी तरीके से किताबों और स्टेशनरी की लिस्ट पब्लिक करनी चाहिए, जिससे अभिभावक कहीं से भी तुलना करके सामान खरीद सकें। जब तक शिक्षा में ‘सर्विस’ से ज्यादा ‘मुनाफा’ हावी रहेगा, तब तक आम आदमी ऐसे ही लुटता रहेगा। सिर्फ यही नहीं, सीबीएसई के निजी स्कूल सभी किताबें NCERT की रखने के बजाय कुछ को In House के नाम से बेच रहे हैं।

कॉपियों पर ‘प्रीमियम’ वसूली:

बिल में 16 कॉपियों (Notebooks) का सेट ₹1300 का है.. यानी एक औसत कॉपी की कीमत ₹80 से ऊपर पड़ रही है। मार्केट में एक सामान्य सिंगल लाइन रजिस्टर ₹40-50 में मिल जाता है, लेकिन यहां माता-पिता से लगभग दोगुना दाम वसूला जा रहा है।
स्टेशनरी का ‘कम्पलसरी’ सेट: बिल में ‘Branded A4 Sheets’, ‘Plastic Pocket Folder’ और यहां तक कि ‘Button Folder’ जैसी चीजें भी शामिल हैं. आमतौर पर ये चीजें घर में मौजूद होती हैं या बच्चा जरूरत के हिसाब से बाहर से ₹10-20 में खरीद सकता है, लेकिन यहां इन्हें ₹1765 के कुल स्टेशनरी बिल का हिस्सा बना दिया गया है।
‘इन-हाउस’ पब्लिशिंग का खेल: किताबों की लिस्ट में NCERT के साथ-साथ कई ऐसी किताबें हैं जो ‘In House’ पब्लिशर की हैं (जैसे इंग्लिश ग्रामर वर्कबुक और मैथ्स एक्टिविटी वर्कबुक). इन प्राइवेट वर्कबुक्स की कीमत ₹350 से ₹450 के बीच है, जबकि सरकारी NCERT किताबें मात्र ₹50-100 की होती हैं।

क्या स्कूल से ही सामान खरीदना अनिवार्य है?

नियमों के मुताबिक, कोई भी प्राइवेट स्कूल किताबें, यूनिफॉर्म या स्टेशनरी अपने काउंटर या किसी खास दुकान से ही खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। सीबीएसई और राज्य शिक्षा विभागों के स्पष्ट आदेश हैं कि स्कूलों को किताबों और स्टेशनरी की लिस्ट सार्वजनिक करनी होगी, जिससे अभिभावक उन्हें अपने हिसाब से खरीद सकें। अगर कोई स्कूल इसे अनिवार्य बताता है या ऐसा न करने पर बच्चे का नाम काटने या उसे प्रताड़ित करने की धमकी देता है तो यह कानूनन गलत है। इस स्थिति में जिले के शिक्षा अधिकारी या संबंधित बोर्ड को लिखित शिकायत भेज सकते हैं।

स्कूल की दादागिरी के खिलाफ शिकायत कैसे करें?
निजी स्कूलों की इस मनमानी के खिलाफ आवाज उठाना आपका अधिकार है. अगर कोई स्कूल आपको किताबों और स्टेशनरी के लिए मजबूर करता है तो आप इन 3 स्टेप्स में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं:

शिक्षा विभाग से शिकायत:

सबसे प्रभावी तरीका अपने जिले के जिला विद्यालय निरीक्षक या बेसिक शिक्षा अधिकारी को लिखित शिकायत देना है। आप शिक्षा विभाग की ऑफिशियल वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भी अपनी बात रख सकते हैं।

CBSE या संबंधित बोर्ड को मेल:

अगर स्कूल सीबीएसई से संबद्ध है तो सीधे CBSE के आधिकारिक शिकायत पोर्टल पर या उनके रीजनल ऑफिस को ईमेल भेज सकते हैं. बोर्ड के नियमों के अनुसार, स्कूलों का व्यापारिक गतिविधियों में शामिल होना उनकी मान्यता रद्द करने का आधार बन सकता है।
मुख्यमंत्री हेल्पलाइन:
कई राज्यों में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन नंबर जारी किए गए हैं। यहां की गई शिकायत पर प्रशासन को एक निश्चित समय सीमा के अंदर जवाब देना होता है, जिससे कार्रवाई की संभावना बढ़ जाती है।

स्कूल शिक्षा का मंदिर होता है लेकिन हमारे देश में प्राइवेट स्कूलों ने शिक्षा को शुद्ध व्यापार बना दिया है। प्राइवेट स्कूल अब मुनाफाखोरी के अड्डे बन चुके हैं।

जिसमें सब्जीमंडी की तरह हर चीज बिकाऊ है और प्राइवेट स्कूलों का एक ही मंत्र है- जितना लूट सको, लूट लो. जहां पर अभिभावकों को ऊंचे दामों पर किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। जो माता-पिता स्कूलों के अंदर खुलीं दुकानों से या फिर बाहर स्कूल के सौजन्य से खुली दुकान से किताबें खरीदने से इंकार करते हैं उन्हें अपने बच्चे का नाम स्कूल से कटवा लेने के लिए कह दिया जाता है। यानी माता-पिता को सिर्फ अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में एडमिट करवाने का अधिकार होता है. बाकी के सारे अधिकार प्राइवेट स्कूल वालों के पास होते हैं। जो अभिभावकों को ATM मशीन समझते हैं जिनकी जेब से वो जितना चाहे, उतना पैसा निकालना अपना अधिकार समझते हैं।

किताबें बेचना बन गया है मेन बिजनेस

पैरंट्स के मुताबिक ये प्राइवेट स्कूलों का बिजनेस मॉडल है। जिसमें शिक्षा देना साइड बिजनेस है और स्कूलों में किताबें बेचना मेन बिजनेस है। जिसमें नो डिस्काउंट, नो बारगेन का बोर्ड लटका होता है।

अभिभावक मनीष कुमार कहते हैं कि इन प्राइवेट स्कूलों में हर किताब पर एमआरपी जानबूझकर बहुत बढ़ी दी जाती है और उस पर कोई छूट बी नहीं दी जाती. जबकि बाहर से ऐसी ही किताबें लें उस पर 20 प्रतिशत तक डिस्काउंट आसानी से मिल जाता है. वे कहते हैं कि सरकार स्कूली छात्रों को किताब- कॉपियों पर सब्सिडी देती है. लेकिन प्राइवेट स्कूलों ने इस अधिकार पर भी डाका डाल दिया है. बाजार से कॉपी और रजिस्टर तक नहीं ले सकते।

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