बुधवार शाम पीएम मोदी चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के घर गए। उनके परिवार से मिले। शुक्रवार को आप नेता अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई। सीबीआई और ईडी ने कोई और पूरक आरोपपत्र और नया केस या शिगूफा नहीं बनाया, जिसके बहाने उन्हें फिर गिरफ्तार किया जाता।
सोशल मीडिया पर चल रहा है कि हरियाणा चुनाव में कांग्रेस को नुक़सान पहुंचाने के लिए भाजपा ने केजरीवाल की जमानत की राह आसान की है। इससे मीडिया के गोदी गणों में नये उत्साह का संचार भी हुआ है। मगर कहानी में बड़ा ट्विस्ट है।
बुधवार से शुक्रवार के बीच हुईं उपरोक्त चारों बातों में कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता मगर घटनाओं का यह क्रम दिलचस्प है। यह लोगों को अपनी कल्पना से कहानी बनाने के लिए प्रेरित करता है।
मगर क्या भाजपा सचमुच सोच रही है कि केजरीवाल के बाहर आने से उसे रणनीतिक लाभ मिलेगा। क्या सच में हरियाणा में आप के मजबूत होने से भाजपा को कोई लाभ मिलेगा?
इन सवालों का जवाब इस सवाल में छुपा है कि हरियाणा में आप के वोटर कौन होंगे? हरियाणा को पंजाब के शीशे में नहीं देखा जा सकता। हरियाणा की मिट्टी, पानी और तासीर पंजाब से एकदम अलग है।
हरियाणा में आप को सबसे ज्यादा वोट पंजाबी और वणिक-व्यापारी समुदाय से मिलेगा, जिसे पिछले दो चुनाव से भाजपा की रीढ़ माना जा रहा था। जीटी बेल्ट, कैथल, हांसी, भिवानी, सिरसा, फतेहाबाद, रोहतक, फरीदाबाद में केजरीवाल जितना प्रचार करेंगे, भाजपा के वोट उतने ही कम होंगे।
कुरुक्षेत्र में लाडवा की बात न भी करें तो बाकी जगह क्या होगा? नारायणगढ़ और अंबाला में क्या होगा? पानीपत और करनाल तक में भाजपा को अपना पिछला प्रदर्शन दोहराना, केजरीवाल मुश्किल कर देंगे।
पिछले दो चुनाव में भाजपा ने 35-1 का जो भांडा बनाया था, उसे वह छह माह पहले खुद ही फोड़ चुकी है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने भजन लाल परिवार के साथ जो किया, उसका हिसाब इसी चुनाव में होना है। खट्टर के बाद अनिल विज के साथ जो बर्ताव हुआ, उसकी कोई भरपाई नहीं है। जनरल वीके सिंह को जिस तरह राजनीति से घर बैठाया गया, वह भिवानी, जींद, कैथल, नूंह और गुड़गांव के ठाकुर समुदाय के लिए चुनाव गया तो बात गई वाली बात नहीं है।
केजरीवाल की रिहाई और उनका प्रचार में कूदना हरियाणा में भाजपा को रौंदकर रख देगा। इसका सीधा फायदा कांग्रेस को होगा। पूरा गणित देखकर इंडिया गठबंधन की दोनों पार्टियां जानबूझकर अलग-अलग लड़ रही हैं। मिलकर लड़ने में कांग्रेस के संगठन को बड़ा नुकसान होता। अलग-अलग लड़ने से पूरा खेल दोधारी तलवार जैसा जबरदस्त हो गया। भाजपा दोनों और से कटेगी। मोदी अभी तक हरियाणा का ह बोलने से कतरा रहे हैं तो इसके पीछे कुछ तो है। कोरोना की चपेट में आने के बाद से शाह के दिमाग की चाणक्य वाली तेजी गायब है।
बिसात इस बार बहुकोणीय है। कांग्रेस को अगर कोई थोड़ा बहुत नुकसान पहुंचा सकता है तो वह इनेलो है। जजपा की तो इस बार कोई बात भी नहीं कर रहा। मगर जो भी है, नतीजे दिलचस्प होंगे। हुडा खुद भी नहीं चाहेंगे कि कांग्रेस 55 से ज्यादा सीटें जीते। ऐसा हुआ तो पूरा खेल हुड्डा के हाथ से हाईकमान के हाथ में चला जाएगा।
इसलिए कांग्रेस की सीटें कम कराने की कोशिश कांग्रेसी ही करेंगे। मगर जनता तो जनता है। कुलमिलाकर नतीजे दिलचस्प होंगे।


