पत्रकार कौन?
एक रीलबाज ने 27 जुलाई को उन्नाव के कोरारी गांव के पास कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेस के धंसने और टूटने का पहला वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया। 4200 करोड़ से बने इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन महज 14 दिन पहले 13 जुलाई को हुआ था। इसके धंसने की पहली पोस्ट को एक्स और इंस्टा पर खूब रीपोस्ट किया गया। लाखों व्यूज मिले।
उसके बाद इस खबर यानी इन्फॉर्मेशन की सैकेंड कॉपी रिपोर्ट लल्लन टॉप और मीडिया के डिजिटल एडिशन और प्रिंट मीडिया में आई।यह खबर जब देशभर में खूब वायरल हो गई।तब टीवी न्यूज चैनल स्टूडियो में इस पर रिपोर्ट तैयार हुई। लाल लिपस्टिक लगाकर, स्ट्रेट बाल करवा कर, महंगी साड़ी और कसी हुई चोली में न्यूज एंकर ने एक्सप्रेस वे धंसने की सूचना की बासी शायद पचासवीं कापी रिपोर्ट अपने दर्शकों के सामने रखी।
उसमें सोशल मीडिया से उठाए हुए क्लिप्स भी चलाए गए।अब सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठा है कि पत्रकार कौन है? क्या रीलबाज या टीवी न्यूज चैनलों के सजे-धजे न्यूज एंकर?क्या वह रीलबाज सचमुच पत्रकार हैं, जिसने जोखिम उठाकर सत्ता के खौफ की परवाह न करते हुए देश की बर्बाद व्यवस्था और भ्रष्टाचार की गर्त में धंस रहे सिस्टम की पहली ग्राउंड तस्वीर दिखाई! पहली सूचना दी। जिसके पास मौके से फर्स्ट हैंड इन्फॉर्मेशन थी।या वह लिपी पुती एंकर पत्रकार है? जिसने मादक अंदाज में उसी रिपोर्ट की एक बासी कॉपी को पढ़ा जो पहले से ही सोशल मीडिया और डिजिटल में वायरल थी तथा प्रिंट मीडिया में भी प्रकाशित थी। अब उसे खबर के रूप में पुनः जारी करने में कोई जोखिम भी नहीं था।
**पत्रकारिकता की तमाम मानक परिभाषाओं के साथ असल में वह रीलबाज तो एक स्वतंत्र पत्रकार साबित होता है। उसके पास सूचना का प्रथम स्रोत है और उस सूचना का प्रसार करने के लिए सोशल मीडिया के जरिए क्षमता भी मौजूद है। उसके व्यूज का आंकड़ा उसके दर्शकों की पहुंच भी बता रहा है। दूसरी और वह लिपी पुती न्यूज एंकर तो सिर्फ देश के संस्थागत मीडिया के गर्त में चले जाने का साक्ष्य है, जिसके पास न तो सूचना का प्रथम स्रोत है और न ही सत्ता की इच्छा के विपरीत जाकर सड़ते सिस्टम की पोल खोलकर सूचना के प्रथम स्रोत तलाशने का साहस! देश में संस्थागत मीडिया, जिस तरह सत्ता और ताकतवर लोगों को पसंद न आने वाली सूचनाओं को दबा रहा है, उसने देश में रीलबाजों यानी स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारों की फौज खड़ी कर दी है।
महान न्यूटन का तीसरा नियम है कि हर क्रिया की बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। इस तरह सत्ता किसी खबर को दबाने में जितनी ताकत लगाएगी, खबर उतनी ही ताकत से बाउंस बैक होकर फैलेगी। सत्ता अगर संस्थागत मीडिया पर शिकंजा कस उसे सूचनाएं देने से रोकेगी तो रीलबाजों के रूप में समाज में स्वतंत्र पत्रकारों की फौज खड़ी हो जाएगी।खबर का यह गुण है कि वह अपने स्रोत से निकलकर उन सब लोगों तक पहुंचेगी ही, जिनके वह काम की है। इसलिए कम्युनिकेशन और पत्रकारिता दुनिया से तब तक खत्म नहीं हो सकते, जब तक दुनिया में जीवन मौजूद हैं।
जब संस्थागत मीडिया नहीं था, तब भी दीवारों के कान होते थे। दीवार के ऐसा कान से सत्ता को हमेशा डर लगता है। अब रीलबाज वही कान बन गए हैं।सत्ता की ऊंची कुर्सी पर बैठे लोगों को यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि खबर को मारा और दबाया नहीं जा सकता। संस्थागत मीडिया को भी यह समझ लेना चाहिए कि अगर सत्ता के दबाव में उसने खबरें दबाईं तो जनता खुद खबरें जारी करने लगेगी। तब संस्थागत मीडिया समाज में अप्रासंगिक हो जाएगा।
दम तोड़ देगा।
