तो क्या मिजोरम की तरह लद्दाख का भी समाधान निकाला जा सकता था…..?

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जल रहे लद्दाख पर 40 साल पहले का दशकों से हिंसा से जूझता मिजोरम याद आया। और याद आए राजीव गांधी।

27 जून 1985: वो दिल्ली की जानलेवा गर्मियों के बाद आई पहली बारिशों की लाई उमस भरी शाम थी। और जगह नार्थ ब्लॉक। उस धूसर शाम में मिजोरम में मिज़ो नेशनल फ्रंट की ‘भारत से आज़ादी’ के लिए सशस्त्र लड़ाई का नेतृत्व कर रहे लालडेंगा प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा शांति वार्ता के लिए नियुक्त किये गए केंद्रीय गृह सचिव आर डी प्रधान के ऑफिस में घुसते हैं.

तमाम चरण की वार्ता असफल हो जाने के बाद प्रधान ने लालडेंगा को यूँ ही एक आखिरी बार चाय पर बुलाया था.

प्रधान ने लालडेंगा को चाय पर ही बताया कि वे 3 दिन बाद रिटायर हो रहे हैं- और अगर लालडेंगा शांति चाहते हैं, नागरिकों के जान माल का नुकसान रोकना चाहते हैं तो राजीवगांधी की शर्तें मान लें- साथ जोड़ते हैं कि राजीव जी के सिवा भारत से अलग होने की हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे समूह के सामने ऐसी सम्मानजनक शर्तें रखने की हिम्मत करना दूर, सोच भी नहीं पाएगा: ये भी कि ये सबके लिए सबसे बेहतर रास्ता होगा- देश के लिए भी, मिजोरम के लिए भी।

लालडेंगा सोचने का वादा करके लौट जाते हैं.

29 जून: प्रधान इंतज़ार करते रहते हैं पर लालडेंगा नहीं आते। प्रधान एक कनिष्ठ अधिकारी को कहते हैं कि उन्हें विश्वास है लालडेंगा ज़रूर आयेंगे। दशकों का ख़ूनख़राबा बंद कर मिजोरम और देश दोनों को जोड़ने का इससे बेहतर न कोई रास्ता है ना इससे सम्मानजनक शर्तें।

30 जून दोपहर: लालडेंगा अचानक वापस पहुँचते हैं, प्रधान से कहते हैं मैं तैयार हूँ. प्रधान उसी सुबह रिटायर हो चुके थे। बताते हैं कि अब वे कुछ नहीं कर सकते, वे रिटायर हो चुके हैं. लालडेंगा के बहुत कहने पर शाम 4.30 पर उनसे मिलने का वादा करते हैं.

मुलाक़ात होती है, प्रधान लालडेंगा को लेकर सीधे प्रधानमंत्री आवास जाते हैं, जहाँ प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने कैबिनेट कमिटी ऑन पोलिटिकल अफेयर्स की आपात बैठक बुला रखी है.

कमिटी पहला फैसला करती है प्रधान की सेवा बढ़ाने का- उस आधी रात तक बढाती है.

30 जून रात: 8.30 पर लालडेंगा, उनकी पत्नी, मिजो नेशनल फ्रंट के नेताओं और मिजोरम के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री ललथनवाला की उपस्थिति में मिजोरम समझौता, 1986 पर हस्ताक्षर होते हैं.

हस्ताक्षर करते हैं- भारत सरकार के लिए गृह सचिव प्रधान, मिजोरम सरकार के लिए मुख्य सचिव ललखामा, और एमएनएफ के लिए लालडेंगा। (राजीव क्रेडिटखोर की तरह क्रेडिट चुराने की कोशिश नहीं करते- देश के नेता ऐसी नीचताओं से बहुत दूर रहते थे।)

भारत सरकार की एक ही शर्त होती है – एमएनएफ सारी हथियारबंद गतिविधियाँ बंद ही नहीं कर देगा, हथियार समर्पण भी करेगा। भारत सरकार मिजोरम को पूर्ण राज्य बनाने का वादा करती है और एमएनएफ के लड़ाकुओं के पुनर्वास का भी.

9.30 रात: आकाश वाणी पर घोषणा हो जाती है.

परिणाम: एमएनएफ हथियार रखता है, अपना संविधान बदल भारत में शामिल होता है और ग्रेटर मिजोरम की लड़ाई छोड़ देता है.

जुलाई 1986: प्रधानमंत्री राजीव गांधी सपत्नीक माने सोनिया गांधी जी के साथ मिजोरम की सद्भावना यात्रा पर जाते हैं. उसके ठीक पहले राज्य की कांग्रेस सरकार सद्भावना और शांति के लिए इस्तीफ़ा दे देती है- अब मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल के बतौर एमएनएफ सत्ता संभालती है- कल के लड़ाके लालडेंगा पूर्ण राज्य के दर्जे के बतौर मिजोरम के पहले मुख्यमंत्री बनते हैं.

राजीव गांधी सोनिया जी के साथ खुली जीप में पूरे मिजोरम में घूमते हैं। मिजोरम के लोगों में भारत सरकार के लिए विश्वास बहाली में ये पहल बहुत काम आती है।

याद रहे कि इंदिरा गांधी जी की निर्मम हत्या के दो साल बाद ही राजीव जी अपनी जान दाँव पर लगा सालों से अलगवादी हिंसा की आग में जल रहे मिजोरम में खुली जीप पर घूम रहे थे। फिर पंजाब में एसपीजी सुरक्षा के बीच जान बचा के भाग पाने का रोना रोने वाले कायरों का सोचिए!

खैर: मिजोरम में 1966 से चल रहा सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन ख़त्म होता है.

मिजोरम तब से शांत है – भारत का गर्वीला अंग है।

लद्दाख जल ही रहा है। इसके पहले उसी मिजोरम की भी जिसमें भाजपा गठबंधन की ही सरकार है!

24 जुलाई 2021: संघीय गृह मंत्री अमित शाह सीमा विवाद को लेकर उत्तर पूर्व जाते हैं, सभी मुख्यमंत्रियों से मिलते हैं.

26 जुलाई: मिजोरम और असम के पुलिस बलों में मुठभेड़ होती है, दोनों तरफ से 6 घंटे तक गोलियाँ चलती हैं, असम के कम से 6 पुलिसकर्मी मारे जाते हैं, 50 से ज़्यादा घायल होते हैं.

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