प्रशांत किशोर मीडिया के चर्चित चेहरों को जिस अंदाज़ में बेइज्जत करते हैं और उसके बाद भी सभी चैनल उनके इंटरव्यू को तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार से अधिक तवज्जो देते हैं, तो इससे क्या समझ आता है? प्रशांत किशोर नए-नवेले नेता हैं। पोलिटिकल स्ट्रैटिजिस्ट होने और जातिगत समीकरणों से आज तक नहीं उबरे बिहार में तीन साल पहले राजनीति शुरू करने में अगणित फ़ासला है। इसके बावजूद पीके मीडिया की पहली पसंद हैं। सोशल मीडिया पर एंकर्स को उनकी जगह बताने के उनके बेलाग अंदाज़ की रील्स एक के बाद एक आ रही हैं।
बिहार से बाहर के लोगों को तो इसलिए मज़ा आ रहा है क्योंकि टीवी में आने की वजह से स्वयं को सेलिब्रिटी समझने वाले पत्रकार अपने ही स्पेशल शो में ‘धोए’ जा रहे हैं। विडंबना है पत्रकारों की बेइज्जती दिखाती रील्स का वायरल होना और निष्पक्ष जनता का ख़ुश हो जाना कि सही तो कह रहा है ये पीके।
वैसे जनता को ख़ुश करने की रणनीति के तहत ही पीके सवाल आने से पहले ही एंकर्स पर दबाव बना देते हैं। उनकी अपनी एक राजनीतिक आंकड़ों के बाज़ीगर की इमेज भी है जिसके साये में आया हर व्यक्ति चाहे वो बड़ा पत्रकार क्यों न हो, ख़ुद को राडार एरिया में महसूस करता ही है। दूसरी तरफ़ एंकर्स भी टीआरपी के आंकड़ों के सापेक्ष आत्मसम्मान सुपुर्द कर चुके हैं। बरसों बाद उनके सामने कोई ऐसा आदमी पड़ा है जो उन्हें बता रहा है सवाल कैसे करने चाहिए और पत्रकारिता का निरापद पहलू क्या है।
अन्यथा तो कैमरे के सामने खड़े होकर कमेंट्री करना और अपना ओपिनियन थोपना पत्रकारिता हो गई है। नतीजतन आमजन भी अब मीडिया की भाषा और उसके झुकाव को समझते हैं। पत्रकारों को पहले भी बहुत कोई सम्मान हासिल न था, अब स्थिति सर्वकालिक बदनामी की है। पत्रकारों को दलाल कहना आम हो गया है। नौसिखिए जर्नलिस्ट इतना भी नहीं समझते कि ये दिन सदा नहीं रहेंगे और उन्हें राजनेताओं के साथ अपनी क़रीबी दिखाने या तस्वीर तक शेयर करने से बचना चाहिए। वे अपने वरिष्ठों से सीख रहे हैं, जो नेताओं के साथ घूमने को अपना रसूख-रुतबा बताते हैं। जिस बात पर शर्म आनी चाहिए उस पर गर्व किया जा रहा है। यह ‘गर्व’ पेशे की अनिवार्यता मान लिया गया है। अब कोई पत्रकार नेता के पास पहुंचता है और नेता अगर उससे पहली बार मिल रहा हो तो समझ नहीं सकता कि इसे इंटरव्यू चाहिए या फेवर!
पीके अपने टीवी साक्षात्कारों में इसे सोची- समझी आक्रामकता से अनावृत करते हैं। वे मीडिया को उसके ही कैमरे में कमतर और दरबारी बताकर जनता के मन का माहौल बनाने में लगे हैं। पीके ‘निगेटिव नैरेटिव’ बनाने के उस्ताद हैं। वे मोदी, राहुल, नीतीश, तेजस्वी सबके निगेटिव प्वाइंट्स गिना रहे हैं वोट प्रतिशत रेखांकित करते हुए कि जनता ने पूर्ण समर्थन किसी को नहीं दिया है और वो विकल्प चाहती है और जो उसे नहीं मिल रहा। वो बता रहे हैं मैं विकल्प हूँ। उनका नैरेटिव ‘विकल्प’ का है, ‘ केजरीवाल कल्चर’ का है, भले ही वे केजरीवाल स्टाइल राजनीति को नकार रहे हैं। मीडिया को आईना दिखाकर अपनी तस्वीर साफ़ करने का ऐसा उदाहरण आपने शायद देखा हो, मैंने नहीं देखा। आपने केजरीवाल के भी इंटरव्यू देखे होंगे, उनकी मीडिया हैंडलिंग अलग नहीं थी लेकिन सॉफ़्ट थी, पीके उनका एग्रेसिव एक्सटेंशन हैं।


