वीपी सिंह के पहले शिकार राजीव गाँधी…..

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भारत मे निम्न स्तर की राजनीति और झूठे आरोपों की शुरुआत का श्रेय वीपी सिंह को दिया जा सकता है, जिन्हे जनता ने क्रांतिकारी समझकर प्रधानमंत्री बनाया मगर वे खोखले सिद्ध हुए।

वीपी सिंह के पहले शिकार खुद राजीव गाँधी थे, 1984 मे ज़ब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने तो कांग्रेस के अंदर एक बड़ा खेमा नाराज था। राजीव ये जानते थे, उन्होंने प्रणव मुखर्जी की जगह वीपी सिंह को वित्त मंत्री बनाया।

वीपी सिंह ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए, उन्होंने राजीव गाँधी के करीबियों पर छापे पड़वाए और राजीव गाँधी की मिस्टर क्लीन वाली छवि को भ्रष्ट मे परिवर्तित किया। राजीव ने उन्हें रक्षा मंत्रालय दिया तो उन्होंने सरकार के कई घोटाले उजागर कर दिए, आख़िरकार उन्हें साइडलाइन किया गया।

उन्होंने 1987 मे कांग्रेस छोड़ दी और ठीक एक हफ्ते बाद स्वीडन के रेडियो ने वही की कम्पनी बोफोर्स पर भारत सरकार को रिश्वत देने का आरोप लगा दिया। इस खबर ने ऐसा तहलका मचाया कि वीपी सिंह रातो रात महान हो गए और राजीव गाँधी की छवि धूल मे मिल गयी।

राजीव गाँधी ने निःसंदेह घोटाला किया था मगर वीपी सिंह ने खुले मंच से उन पर कई बेबुनियाद आरोप भी लगा दिए और यही से राजनीति मे झूठे आरोप शुरू हुए। राजीव के करीबी अरुण नेहरू और बीजू पटनायक भी वीपी से मिल गए और जनता दल नाम की नई पार्टी बना ली।

बीजेपी पहले से राम मंदिर के रथ पर सवार थी, 1989 के चुनाव ने कांग्रेस को बहुमत से हमेशा के लिए दूर कर दिया। बीजेपी और कम्युनिस्टो के बाहरी समर्थन से वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गए। वो प्रधानमंत्री जिनका उन्ही की पार्टी के चंद्रशेखर पैर खींच रहे थे।

वीपी सिंह काम करने की बजाय तुष्टिकरण के रथ पर सवार हुए, अम्बेडकर को भारत रत्न दिलवाया ताकि दलित वर्ग को खींच सके। इसका कांग्रेस ने विरोध किया था, साथ ही पैगम्बर मोहम्मद की जयंती पर छुट्टी घोषित कर दी।

बीजेपी बाहर से समर्थन दे रही थी मगर उसके इरादे स्पष्ट थे, वीपी सिंह ने इसी बीच आरक्षण लागू किया जिसका बीजेपी कांग्रेस दोनों ने पुरजोर विरोध किया। बीजेपी ने मंडल के जवाब मे कमंडल चलाया और राम रथ यात्रा निकाली, आडवाणी की गिरफ्तारी के चलते बीजेपी ने समर्थन वापस लिया और वीपी सरकार गिर गयी।

वीपी सिंह उस जमाने के अरविन्द केजरीवाल थे, हीरो बनकर आये मगर अंत मे सिर्फ सत्यानाश किया और जनता को सन्देश दे दिया कि बीजेपी और कांग्रेस ही ठीक है। राम मंदिर, कश्मीर, मुस्लिम तुष्टिकरण, आतंकवाद और जातिवादी राजनीति के प्रणेता वीपी सिंह कहे जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होंगी।

उन्ही का जनता दल कई हिस्सों मे बिखरा, इसके कुछ धड़े जैसे नीतीश कुमार, देवगोड़ा और अजित चौधरी आज बीजेपी के साथ है जबकि लालू और मुलायम जैसे धड़े कांग्रेस के साथ। नवीन पटनायक जैसे अपवाद दोनों से दूर है मगर बीजेपी के साथ खडे होते है। जो बीजेपी बाहर से समर्थन दे रही थी वह सत्ताधीश है।

जो कांग्रेस मंडल कमीशन का विरोध कर रही थी उन्ही का पाड़ा राहुल गाँधी अब जाति जाति चिल्लाता रहता है, जो बीजेपी तब तकनीकी विकास के विरोध मे थी वो आज पक्ष मे है और जो कांग्रेस पक्ष मे थी उसका कन्हैया कुमार सड़क बनने के नुकसान गिना रहा है।

राजीव गाँधी का विरोध करने वाली बीजेपी तकनीक के क्षेत्र मे उनसे आगे खड़ी होती है जबकि राजीव गाँधी का फोटो लगाने वाली कांग्रेस जाति जाति चिल्लाकर उन्ही की विचारधारा पर काली स्याही लगाती नजर आती है। यही राजनीति है सत्ता और विचारधारा का चक्र ऐसे ही बदलता है।

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राजनीति और सामाज के अंदर तक घुसपैठ कर चुके विषैले विषाणुओं को मारने वाला किटाणुनाशक....
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"जो नहीं हो सकता वहीं तो करना है".....

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