गंगा मेमोरियल अस्पताल……नाम धार्मिक और काम मरीजों की जान लेना…..

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गंगा मेमोरियल अस्पताल……
नाम धार्मिक और काम मरीजों की जान लेना…..
डाक्टर और अस्पताल दो ऐसे शब्द हैं जो किसी आम आदमी के जीवन में सबसे अहम स्थान रखता है। चिकित्सक को धरती पर ईश्वर का दूसरा रूप कहा जाता है, क्युकी इनका काम मरीजों की जान की हिफाजत करना होता है। परंतु व्यावसायिकता के इस दौर में डाक्टर जब डाक्टर ना होकर बनिया बन जाते हैं तो मरीजों की जान को भी रुपये की तराजू में तौला जाता है।
घाटशिला में डाक्टर नागेन्द्र सिंह ने गंगा अस्पताल शुरू किया था गरीबों को बेहतर और सुविधाजनक इलाज प्रदान करने के लिए। कालांतर में जमशेदपुर शहर में भी मानगो के डिमना रोड में आस्था स्पेस टाऊन के सामने गंगा मेमोरियल अस्पताल की शुरुआत की गई।
यहीं से शुरू हुई मरीजों की जान से खेलने की ठेकेदारी प्रथा। जमशेदपुर शहर की शाखा को झोलाछाप डाक्टरों और गैर प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ के सहारे छोडकर डा० नागेन्द्र सिंह की दौड़ शुरू हुई जमशेदपुर और घाटशिला के दोनों अस्पतालों के बीच।
गंगा मेमोरियल अस्पताल में पूर्व में भी कई बार इलाज में लापरवाही की वजह से मरीजों की जान जा चुकी है और मृतकों के परिजनों द्वारा असंख्य बार इस “मोक्ष” रुपी अस्पताल में तोडफ़ोड़ और हंगामा किया जा चुका है।
हर बार अस्पताल के संचालक डा० नागेन्द्र सिंह अपनी और अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही को मानने के बजाय परिस्थितियों और मरीजों को ही दोष देते नजर आते हैं।
ताजा घटना चाकुलिया के बरहाटोली निवासी और सब पोस्टमास्टर कृष्णा रुहीदास गंगा मेमोरियल अस्पताल में अपनी पित्त की थैली का आपरेशन करवाने शुक्रवार दोपहर 12 बजे के करीब एडमिट हुए।।
जो मरीज आपरेशन थिएटर में स्वंय चलकर गया हो डेढ़ घंटे बाद डा० नागेन्द्र सिंह ने कहा कि मरीज की मौत हो गई है।
मरीज की मौत की अप्रत्याशित खबर सुनने के बाद परिजन आक्रोशित हो गए और अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए और जमकर हंगामा किया।
मृतक के परिजनों के अनुसार आपरेशन थिएटर में ले जाने से पहले अस्पताल में ECG सहित सारे टेस्ट किए गए थे और मरीज बिल्कुल स्वस्थ था। परिजनों के अनुसार आपरेशन से पहले मरीज को बेहोश करने के लिए दिए जाने वाले एनस्थीसिया के डबल खुराक की वजह से मरीज की जान चली गई।
हर बार की तरह इस बार भी अपनी सफाई में डा० नागेन्द्र सिंह ने अपनी कोई गलती नही मानी और मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया।
अब यह तो मरीज की निष्पक्ष पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ही पता चल पाएगा की सच्चाई क्या है।
परन्तु ऐसी घटनाएं समाज को विचलित करती हैं और इन परिस्थितियों में डाक्टर ईश्वर का दुसरा रुप नहीं यमराज का दुसरा रुप नजर आते हैं।

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"जो नहीं हो सकता वहीं तो करना है".....

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